पिता।

                      
पिता    से    भरा    पूरा     घर     है
नहीं    तो    दूभर    गुजरबसर    है।

वे    हैं    तो   सभी    अपने    लगते
वरना   अजनबी    पूरा    शहर    है।

परिवार   में   सुख  -चैन   की   बंसी
सब  उनकी  मिहनत  का  असर  है।

जिसने  कभी  रुकके देखा ही  नहीं
कि  सुबह – शाम या तप्त दोपहर है।

अपने  हर  शौक  को  सहर्ष    छोड़ा
ऐसी  कुर्बानी  भी  मिलती किधर है।

पिता  से  घर- गृहस्थी  सब  आबाद                                नहीं  तो  दुनिया भी  ढाती  कहर  है।

पिता  के बिना  जीना  आसान  नहीं
उनसे   जुदाई   भी   एक   जहर   है।

अनिल मिश्र प्रहरी।

विनती (अनिल मिश्र प्रहरी)

                   
त्रिविध ताप कर शमित हमारे भोले शंकर।

         राह कठिन, मंजिल भी धूमिल,
         पैरों  में   छाले,  उजड़ा   दिल।
आज  हमें दर्शन  दे देखूँ  तुझको  जी भर।
त्रिविध ताप कर शमित हमारे भोले शंकर।
          फैल  रहा  प्रतिपल   अँधियारा,
          हर पल ठोकर, चल-चल हारा।
आकर  हमें  बचा  ले वरना  जाऊँगा  मर।
त्रिविध ताप कर शमित हमारे भोले शंकर।
           वैर,   भेद,   आतंक,   निराशा,
           नर, नर के शोणित का प्यासा।
अपनों  ने अपनों का देखो  फूँक दिया घर।
त्रिविध ताप कर शमित हमारे भोले  शंकर।                                  
           मूल्य – ह्रास, आचार –  हीनता
          भ्रमित बुद्धि, भय और दीनता।
जन-जन का कल्याण करो, पीड़ा सबकी हर।
त्रिविध  ताप  कर  शमित  हमारे  भोले शंकर।
            सीमा  पर  दुश्मन  के  गोले,
            दे त्रिशूल अब अपना भोले।
सर्वनाश  कर  दे  बाबा  दुश्मन  को  धर-धर।
त्रिविध  ताप  कर शमित हमारे  भोले शंकर।

अनिल मिश्र प्रहरी।


                बेरोजगारी नाम है।
फैला  चतुर्दिक  भुज मेरा
दुर्दिन दुलारा, अनुज मेरा,
सत्ता   हमारी  जगत्   पर
गृह  हर  नगर, हर ग्राम है।
                बेरोजगारी नाम है।

अगम्य, विस्तृत जाल हूँ
बढ़ती  रही  हर साल हूँ,
जाती वहाँ शिक्षित जहाँ
होता  वहीं   विश्राम   है।
               बेरोजगारी नाम है।

दृग   हैं  नहीं   मेरे   सरल
आँचल तले  रखती  गरल,
जिस पर नजर जा रुक गई
वह   आदमी    बेकाम   है।
              बेरोजगारी नाम है।

जाति -वंशज सब बराबर
तट  कोई  लेती  घड़ा भर,
हर  नगर   मेरा   ठिकाना
हर  शहर  सुख – धाम   है।
              बेरोजगारी नाम है।

जग  चाहता  है  बाँधना
मेरे  हनन  की   साधना,
मुझपर विजय की चाह में
करता  न नर  आराम है।
              बेरोजगारी नाम है।

मेरी  लहर  पर  राजनेता
वोट   ले   बनते   विजेता,
पर न डरती मैं कुलिश से
घोषणा      सरेआम    है।     
              बेरोजगारी नाम है।
अनिल कुमार मिश्र।

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